मुंबई की दोपहर बेहद गर्म थी और मास्टर बेडरूम में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा चलने के बावजूद रोहन मेहरा के माथे पर पसीना चमक रहा था. वह यहाँ एक साधारण क्लेम वेरिफिकेशन के सिलसिले में फाइल लेकर पहुँचा था, जो किसी भी बीमा कंपनी का रोजमर्रा का काम होता था. कोई मर जाता था, रिश्तेदार क्लेम फाइल करते थे और एजेंट मौके पर जाकर औपचारिकता पूरी कर लेते थे. रोहन ने अपनी नौकरी में ऐसे सैकडों मामले निपटाए थे, लेकिन जैसे ही उसने फाइल खोलकर उसमें लगी तस्वीर देखी, उसका माथा ठनका.

तस्वीर साठ साल के राजेश कपूर की थी, जो गोरे, छरहरे बदन वाले, माथे पर हल्की झुर्रियों और धँसी हुई आँखों वाले व्यक्ति थे. रोहन ने उस कागज से नजरें हटाकर जब सामने बिस्तर की तरफ देखा, तो वहाँ पचास से भी कम उम्र का एक साँवला और भारी शरीर वाला आदमी बेजान पडा था.

उसके हाथ में पकडी फाइल अचानक काँप गई. उसने अविश्वास से पहले उस तस्वीर को देखा, फिर बिस्तर पर पडी लाश को, और फिर दोबारा कागज पर छपे चेहरे को मिलाया. यह वह आदमी बिल्कुल नहीं था. उसकी साँस एक पल के लिए गले में ही अटक गई और दिमाग में कई सवाल दौडने लगे कि यह मृत व्यक्ति कौन था, असली राजेश कपूर कहाँ था और वह खुद इस पचडे में कैसे फँस गया.
सब ठीक है? कमरे के कोने से अचानक एक आवाज आई.
रोहन ने मुडकर देखा तो मृतक की पत्नी सलीके से बँधे बालों और सादी साडी में बिना किसी घबराहट के बिल्कुल शांत खडी थी. उसके चेहरे पर न कोई आँसू था और न ही कोई परेशानी, मानो उसने किसी बीमा एजेंट को नहीं बल्कि किसी आम मेहमान को चाय पर बुलाया हो.

रोहन ने अपना गला साफ करते हुए फाइल थोडी ऊपर उठाई. जी, दरअसल मैं तस्वीर से मिलान कर रहा था, तो मुझे पहचान में थोडी गडबडी लग रही है।
यह सुनकर पत्नी ने एक कदम आगे बढाया और अपनी निगाहें रोहन के चेहरे पर गडा दीं. वह मेरे पति हैं, डॉक्टर के दस्तखत के साथ डेथ सर्टिफिकेट भी पूरी तरह दुरुस्त है।
हाँ, वह बात तो ठीक है, लेकिन इस पॉलिसी की तस्वीर में-
उम्र ढलने के साथ इंसान का चेहरा बदल ही जाता है, उसने बिना आवाज ऊँची किए रोहन की बात बीच में ही काट दी.
रोहन ने एक बार फिर तस्वीर पर नजर डाली, क्योंकि कोई भी साठ साल का गोरा आदमी कुछ ही सालों में साँवला और भारी नहीं हो सकता था. यह उम्र का बदलाव नहीं था, बल्कि सरासर झूठ था. सामने खडी औरत बिना पलक झपकाए उसे लगातार देख रही थी, जैसे उसे पहले से पता हो कि एजेंट क्या पूछने वाला है और उसे क्या जवाब देना है.
रोहन का दिल बैठ गया और उसे समझ आ गया कि यह औरत किसी भी तरह से बदहवास नहीं बल्कि पूरी तैयारी से बैठी थी. उसने बिना कोई हलचल दिखाए धीरे से फाइल बंद की और सारे कागजात समेट लिए, क्योंकि उसका दिमाग अब केवल यहाँ से तुरंत बाहर निकलने का इशारा कर रहा था.
देखिए, रोहन ने अपनी आवाज को सामान्य बनाते हुए कहा, मुझे दफ्तर जाकर कुछ और दस्तावेज देखने होंगे क्योंकि यह हमारी तय प्रक्रिया है, इसलिए मैं कल दोबारा आकर सब निपटा दूँगा।
उसने अपना बैग उठाया और एक पेशेवर मुस्कान लाने की कोशिश की, जो वह अक्सर मुश्किल ग्राहकों के सामने इस्तेमाल करता था. औरत की नजरें उसके बैग से फिसलकर उसके हाथों और फिर चेहरे पर टिक गईं.
जरूर, उसने सपाट आवाज में सिर्फ इतना ही कहा.
रोहन तेजी से दरवाजे की तरफ बढ गया, यह अच्छी तरह जानते हुए कि वह औरत अब भी उसकी पीठ को घूर रही थी, मगर उसने मुडकर देखने की गलती नहीं की. रोहन दरवाजे की चौखट तक पहुँचा ही था कि पीछे से एक आवाज गूँज उठी.
इतनी जल्दी क्या है? एक कप चाय तो पी लो।

वह वहीं ठिठक कर रुक गया. उसका पूरा दिमाग चीख रहा था कि बस निकल जा, अभी बाहर भाग जा, लेकिन उसके पैर जमीन से पूरी तरह चिपक चुके थे. उसने पलटकर देखा तो पत्नी रसोई के दरवाजे पर खडी थी, जहाँ उसके होंठों पर हल्की मुस्कान और आँखों में वही बेडरूम वाली ठंडक तैर रही थी. उसकी आवाज में एक अजीब मिठास घुली थी, लेकिन वह मिठास किसी आम मेहमाननवाजी से तो बिल्कुल नहीं आ रही थी.
रोहन जानता था कि उसे तुरंत मना कर देना चाहिए. उसे बस एक साफ" नहीं, शुक्रिया" बोलकर बाहर का दरवाजा खोलना था, मगर मुँह से निकला, ज- जी, ठीक है।
उसने मन ही मन खुद को एक भद्दी गाली दी.
बैठने की हिम्मत न होने पर वह चुपचाप सोफे के पास ही खडा रहा, जबकि पत्नी रसोई में चली गई और कुछ ही पलों में बर्तनों की खनखनाहट सुनाई देने लगी. रोहन की नजर कमरे में लगातार घूमती रही, जहाँ दरवाजा, खिडकी और बालकनी सब साफ दिख रहे थे. बालकनी का दरवाजा थोडा खुला पाकर वह धीरे- धीरे उस तरफ बढा, मानो केवल ताजी हवा लेने जा रहा हो.
नीचे सडक पर नजर पडते ही उसका पेट बुरी तरह मरोड खा गया.
बिल्डिंग के ठीक सामने एक सफेद पुलिस जीप आकर रुकी हुई थी, जिससे दो सिपाही नीचे उतर रहे थे और उनकी खाकी वर्दी दोपहर की तेज धूप में चमक रही थी. एक सिपाही ने अपनी टोपी सीधी की, जिसके बाद दोनों ने सीधे बिल्डिंग के मुख्य प्रवेश द्वार की तरफ अपने कदम बढा दिए.

रोहन ने काँपते हाथों से बालकनी की रेलिंग जकड ली.
दिमाग में एक ही भयानक सवाल घूम रहा था कि क्या उन्हें सब कुछ पता चल गया था, क्या किसी ने फोन करके बता दिया था, या फिर वह खुद किसी सडक के कैमरे में कैद हो गया था? उसने अपने दिल को यह समझाने की कोशिश भी की कि पुलिस शहर के किसी दूसरे काम से आई होगी, लेकिन जीप का नंबर, सिपाहियों की सधी हुई चाल और बिल्डिंग का दरवाजा, सब कुछ केवल उसी की ओर इशारा कर रहे थे.
वह घबराकर बालकनी से पीछे हट आया.
चाय तैयार है।

पत्नी हाथ में ट्रे थामे सामने आकर खडी हो गई, जिसमें दो कपों में गर्म चाय और दो बिस्किट रखे थे. रोहन ने एक कप उठाया और सोफे पर बैठ गया, हालाँकि इस समय उसे चाय की रत्ती भर भी जरूरत नहीं थी.
पत्नी ठीक उसके सामने बैठ गई और बिना पलक झपकाए उसे ताकने लगी.
तुम काफी परेशान लग रहे हो, उसने बहुत धीमे स्वर में टोका.
रोहन ने कप को दोनों हाथों से कसकर थाम लिया ताकि हाथों का काँपना छिप सके, नहीं, बस थोडी गर्मी लग रही है।
गर्मी? पत्नी ने एक पल के लिए उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा, कमरे का एसी तो पूरी तेजी से चल रहा है।
हाँ, मतलब बाहर से आया था तो-
रोहन ने अपनी बात बीच में ही अधूरी छोड दी. पत्नी ने कुछ नहीं कहा, बल्कि चुपचाप चाय का एक घूँट भरकर उसे लगातार देखती रही, जिससे उसकी वह खामोशी किसी तीखे सवाल से भी ज्यादा भारी लगने लगी.
रोहन ने भी चाय का एक बडा घूँट भरा, जिससे उसका गला बुरी तरह जल गया, पर उसने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया.
सब ठीक है, उसने इस बार थोडा जोर देकर कहा, ताकि खुद को भी यकीन दिला सके.
पत्नी ने बस धीरे से सिर हिलाया और उसके चेहरे पर वही सपाट मुस्कान बनी रही. रोहन ने बालकनी की तरफ फिर देखा, जहाँ से नीचे की सारी आवाजें गायब हो चुकी थीं, जिसका सीधा मतलब था कि सिपाही इमारत के अंदर दाखिल हो चुके थे. वह काँपते हाथों से कप मेज पर वापस रखने ही वाला था कि तभी फ्लैट के मुख्य दरवाजे पर अचानक तेज दस्तक हुई.

एक बार, दो बार, और फिर तीसरी बार.
उस आवाज के साथ रोहन का धडकता हुआ दिल एक पल के लिए मानो बिल्कुल थम गया. दरवाजे पर तीन दस्तकें गूँजी थीं और उनकी भारी आवाज रोहन के कानों में अभी भी लगातार गूँज रही थी.
पत्नी ने हाथ में पकडा चाय का कप बिना किसी हडबडाहट के मेज पर टिका दिया. उसके चेहरे पर न कोई घबराहट थी और न ही चाल में कोई जल्दबाजी, बल्कि वह इतनी सहजता से उठकर दरवाजे की तरफ बढी जैसे उसे पहले से ही खबर हो कि बाहर कौन खडा है.
रोहन की नजरें लगातार उसकी पीठ पर ही टिकी रहीं. उसने झटके से अपनी फाइल उठाई और काँपते हाथों से बिखरे हुए कागजात समेटने लगा, मगर उसकी उँगलियाँ कागजों के बीच बुरी तरह उलझ रही थीं. दिमाग का एक कोना अब भी दिलासा दे रहा था कि शायद कोई पडोसी होगा या कोई कूरियर वाला, लेकिन दिल इस तसल्ली को मानने को बिल्कुल तैयार नहीं था. नीचे पुलिस की जीप साफ दिख रही थी, सिपाही सीढियाँ चढकर ऊपर आ चुके थे और बाहर की बाकी सारी सुगबुगाहट एकदम थम चुकी थी.
पत्नी ने आगे बढकर दरवाजा खोल दिया. सामने खाकी वर्दी नजर आते ही रोहन का पेट अंदर तक मरोड खा गया.

आने वाला इंस्पेक्टर लगभग चालीस की उम्र का एक गठीले बदन वाला आदमी था, जिसके चेहरे का सख्त जबडा और माथे की गहरी सिलवटें देखते ही बनती थीं. उसने भीतर कदम रखते हुए महज एक सरसरी नजर में पूरे कमरे का मुआयना किया, और फिर उसकी तेज आँखें सीधे रोहन के चेहरे पर आकर ठहर गईं.
यह कौन हैं? इंस्पेक्टर ने पत्नी की तरफ देखे बिना ही सीधा सवाल दागा.
रोहन ने घबराहट में फाइल को अपनी छाती से चिपका लिया और झट से खडा हो गया. पैर जमीन पर जमे तो थे, पर अंदर से वह बुरी तरह काँप रहा था.
जी, मैं. मैं रोहन मेहरा हूँ. उसकी आवाज हलक में ही फँसती हुई निकली, बीमा कंपनी से आया हूँ, बस क्लेम वेरिफिकेशन के सिलसिले में.
इंस्पेक्टर ने एक सधा हुआ कदम आगे बढाया. उसकी निगाह पहले रोहन के हाथों में दबी फाइल पर गई, और फिर धीरे से उठकर उसके चेहरे पर जम गई.
कोई पहचान पत्र है?
रोहन ने अपनी जेब टटोली. उँगलियों से पहले घर की चाबियाँ टकराईं, फिर मोबाइल फोन हाथ आया और आखिरकार उसने बीमा कंपनी का कार्ड बाहर निकाला. कार्ड बढाते हुए उसका हाथ साफ तौर पर काँप रहा था.
इंस्पेक्टर ने कार्ड हाथ में लेकर उसे उलट- पलट कर देखा. कुछ पल खामोश रहने के बाद उसने रोहन को सिर से पैर तक इस तरह परखा जैसे कोई किसी संदिग्ध चीज की बारीकी नाप रहा हो.
यहाँ कब आए थे आप?
जी, थोडी ही देर हुई है. बस कुछ जरूरी दस्तावेज देखने थे. वो सब पूरे हो गए, तो अब मैं निकल ही रहा था.
निकल रहे थे. इंस्पेक्टर ने उसके कहे शब्दों को धीरे से दोहराया, जैसे उसे उस बात में कोई गहरी खोट नजर आ रही हो.
रोहन के माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं. कमरे में एयर कंडीशनर पूरी रफ्तार से चल रहा था, मगर फिर भी उसके बदन में एक तपिश सी भर गई थी.
इंस्पेक्टर ने कार्ड वापस उसकी तरफ बढा दिया और अपनी नजरें बेडरूम के उस बंद दरवाजे पर टिका दीं. उसने मुख्य दरवाजे के पास चुपचाप खडी पत्नी को देखा और फिर दोबारा रोहन की ओर घूम गया.
वहाँ क्या है? उसने बंद कमरे की तरफ इशारा करते हुए पूछा.

रोहन के सूखे गले से एक लफ्ज भी नहीं फूट सका.
रुकिए यहीं, इंस्पेक्टर ने सपाट आवाज में कहा और बिना रुके सीधे बेडरूम की ओर कदम बढा दिए.
रोहन वहीं अपनी जगह सुन्न खडा रह गया. हाथ में फाइल थी, घुटनों की ताकत जवाब दे चुकी थी और दिमाग में सिर्फ यही बात हथौडे की तरह बज रही थी कि अब यहाँ से बचने का कोई रास्ता बाकी नहीं बचा है. इंस्पेक्टर उस कमरे के अंदर कदम रखेगा, फर्श पर पडी लाश को देखेगा, फिर हाथ की फाइल में लगी तस्वीर से मिलान करेगा और उसका सारा खेल हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा.
उसने बेबसी से अपना सिर हल्का सा झुका लिया.
ठीक है. उसने बुझे हुए मन से बस इतना ही कहा.
उसकी आवाज में कोई दम नहीं बचा था. माथे से ढुलकती पसीने की एक पतली लकीर कनपटी से होते हुए गाल तक उतर आई थी. तभी इंस्पेक्टर ने बेडरूम का दरवाजा आगे धकेला और कमरे के अंदर चला गया.

दरवाजे के पास खडी पत्नी ने गर्दन घुमाकर रोहन को देखा. उसके चेहरे पर पहले की ही तरह एक अजीब, भावहीन सन्नाटा पसरा हुआ था.
रोहन ने काँपते हाथों से अपनी फाइल को और जोर से भींच लिया.